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हम हम हैं...

हम हम हैं,
इस बात में दम हैं,
क्लास हम नहीं जाते तो फिर करते क्या हैं?
लाइब्रेरी को आज भी हमारा इन्तजार है।
प्रोफ़ेसर हमारी एक झलक देखने को बेकरार है।।
और हम, हम इतने बड़े मक्कार हैं,
24 घन्टे हमें इस सड़ेले से ओरकुट का बुखार है।।


पहले हमें होम सिकनेस ने सताया था,
अब घर से दूरियों ने बहकाया है,
हमने ज़माने में सबसे प्यार किया,
पर जिससे भी इजहार किया,
उसने हमें रुलाया है।।


अन्दर से हम स्वीट ऐन्ड सोफ़्ट हैं,
बट बाहर से थोड़े टेक्निकल फ़ाल्ट लगते हैं,
अजी छोड़िये भी यह सब तो केवल बातें हैं,
हम लड़कियों को मिस इण्डिया कहते नहीं थकते,
उन्हें हम सेल का माल नज़र आते हैं।।


सारी जिन्दगी हमें हमारी गलतफ़हमियों ने बहकाया,
हमने ह्यूमर लाया तो लोगों ने हमको मामू बनाया है,
हम भारत की मिट्टी की अनुपम खोज हैं,
लोग कहते नहीं थकते हम धरती का बोझ हैं।।


बट अब जो हैं सो हैं,
हमारी सोच सबसे अलग है तो क्या हुआ,
वो तो हम मानवता के मनु नहीं बने,
वरना मनु अकेला जिन्दा बचा था,और कुछ जानवर भी बचाये थे,
हम तो खुद से क्या उम्मीद रखें,उन जानवरों को भी डुबाते।
अब तो गली के कुत्ते हम पर भौंकने से भी इनकार करते है,
हमारे हाथों से मच्छर भी नहीं मरते हैं।।



य…

वो सुबह कब आयेगी...

सुबह जब ओस गहराती है,
फिर वही बात याद आती है,
वो चाँद का ढलना,
वो सूरज का आना,
वो कनखियों से फूलों का मुस्कुराना,
पर क्यों नहीं लगता ये सब उतना सुहाना,
जितना तब था,
क्यों फूल चुभते हैं हृदय के पोरों पर,
क्यों सूरज हरे कर देता है घाव सीने के,
क्यों सुई सी चुभती है ये सुबह,
क्या था तुम्हारी उस मुस्कान मे,
कि जब तुम मुस्कुराती थी,
ये सारा आसमान अपना सा लगता था,
जब तुम पलकें झपकाती थी,
लगता था जैसे सारा जहान मेरे साथ है,
पर फिर एक दिन अचानक तुम मुझे छोड़कर चली गयी,
तुम नही आयी,
पर तुम्हारी खबर आयी,
ऐसी भी क्या मजबूरियाँ थी,
कि मुझसे बेवफ़ाई की तुमने,
अब तुम तो जैसे तैसे जी ही रही होगी,
पर मैं जानता हूँ अपनी ज़िन्दगी को,
बिना साँस के जीना क्या होता है,
बिना एहसास के जीना क्या होता है,
पर फिर भी जी रहा हूँ मैं,
बस एक आस के साथ,
उस सुबह के इंतज़ार में।

खबरदार

लाला और शमशेर बहादुर दोनों बचपन के यार,
दोनों ने मिल बैठ बनाई मिली जुली सरकार,
कुछ विकास की माला जापे, कुछ को आत्मविकास,
सब के सब ढोंगी पाखन्डी, रोज़ रचावत रास।

बात-बात में बात बढ़ गयी बढ़ गया अन्तर्द्वन्द्व,
बने विपक्षी ये दोनों हुए सत्ता पक्ष के खण्ड,
दोनों ने मिल-बाँट के काटे हिन्दू-मुस्लिम तार,
दंगे की शुरुआत हुई और मच गयी हाहाकार।।


हर तरफ़ खून की नदियाँ बह रही थी,
लाशें तैर रही थीं लाल-लाल पानी में,
खून ही खून था खून का सैलाब था,
बनी हज़ारों विधवायें हाय इस जवानी में;
जनतंत्र में, गणतंत्र में, नेताओं के षडयंत्र में,
बहता रहा खून इस भारत लोकतंत्र में।।


यदि अब भी हम ना घेर सके इन नेताओं को,
उनकी हर गलती को दुर्भाग्य मानते रहे,
हर नेता अपनी कोठी बनाये करोड़ों से,
गरीब जाड़े में ठिठुर-ठिठुर काँपते रहे।

तो वो दिन दूर नहीं जब हम भी सड़क पर नज़र आयेंगे,
अभी तो एक हाथ पानी में डूबे हैं,कपडों में लिपटे हैं,
जब प्यास लगेगी प्यासे रह जायेंगे,
जब भूख लगेगी दोनों हाथ फ़ैलायेंगे।।

मातृभूमि

Image
हे माँ!तुझसे बढकर ना कोई अपना,
अब जागा हूँ नींद से देख रहा था सपना।
करुणा ममता अपनेपन में तू अनुपम है,
दया प्रेम सौहार्द्र का तू संगम है।।

जब मैं रोया तूने मुझको गले लगाया,
जब भी मुस्काया तूने है साथ निभाया।
चला गिरा दौड़ा लातें भी मारी तुझपर;
पर न्योछावर करती रही तू प्रेम निरन्तर।।

अगर कोई संसार में बढ़कर तुझसे, माँ, है,
भले विधाता कहे ये मुझसे झूठ कहा है।
अपना पेट काटकर मुझको रोटी देती,
बदले में मुझसे ना है कुछ भी लेती।
जीवन भर तू हर पल मुझको अपनाती है,
बाद मृत्यु के काम मातृभूमि आती है।।

तेरी मिटटी का सोंधापन मुझको भाता ,
तेरा निर्मल जल है सबकी प्यास बुझाता।
उसी मातु पर कोई विदेशी आँख गड़ाये,
तेरी रक्षा ना पुत्र तेरा कर पाये।
माँ डरना मत तू इतने पुत्रों की माँ है,
बाल तेरा छू जाये किसी में शक्ति कहाँ है।।

जिस-जिस ने आघात तुझे माँ पहुँचाये हैं,
वो तेरा मातृत्व नहीं जान पाये हैं।
पुत्र सुपुत्र कुपुत्र भले जैसा जो भी हो,
पर भारत माँ ममता का आगार तुम्ही हो।
अगर दोबारा इस धरती पर जीवन पाऊँ,
भारत माँ हर बार तेरा बेटा कहलाऊँ।।

तदात्मानं श्रजाम्यहम्

दो गृहस्थाश्रमश्रमी तरुवृंद मध्य अवगुंठित हुए, मुष्टिकाप्रहार के परिणाम से किञ्चित मर्म प्रस्फुटित हुए अरुण नेत्र, वारिज नयन, दोनों का रक्तरंजित तन; मन क्रुद्ध श्वास अवरुद्ध हाहाकार से पूरित हुआ वन॥
यह सम्पूर्ण कर्ताकर्ममय प्रकरण न, अपितु प्रयोज्य था,
इस युद्ध में विजयीसदॄश बालि मरण के योग्य था
वानरदल अधीप सुग्रीव इस युद्ध में असमर्थ था,
यदि पराजय निश्चित ही थी, तब युद्ध का क्या अर्थ था॥

पर अर्थ था इस युद्ध का कि अनर्थ रोका जा सके,
सुग्रीव की अर्धांगिनी सुग्रीव वापस पा सके।
इस अर्थ पूरण हेतु प्रभु श्रीराम ने किया बाण संधान,
वध हुआ अब बालि का दिग्गज थे प्रत्यक्ष प्रमाण॥

दिग्-दिगन्त हर्षित हुए, पुष्पवृन्द वर्षित हुए,
अधर्म का वध जान सब अधर्मी प्रतिकर्षित हुए॥
हे प्रभु, मम सम दीन नहिं, नहिं तुम सम दीनानाथ
मेरी भव-बाधा हरौ कृपासिन्धु रघुनाथ॥

क्योंकि है सपना अभी भी ...

मैं नहीं हूँ जानता क्यूँ आदमी आया यहाँ,
मैं न हूँ यह जानता क्यूँ मैं हूँ भरमाया यहाँ।
पर छुपी है एक अभिलाषा मेरे मन में कहीं;
सिर्फ़ आना और जाना है मेरा मकसद नहीं।

गर नहीं यह लक्ष्य तो फ़िर लक्ष्य क्या है,
देखकर बोला वो मुझसे प्रश्न तो उत्तम कहा है।
पर नहीं क्या जानते तुम;
सत्य तेरे सामने है, पर नहीं पहचानते तुम।

मैं न जाना सत्य क्या है,
बस रहा यह देखता, हर कृत्य क्या है।
और शायद देखकर भी ना दिखा हो,
सत्य मेरे हर तरफ़, हर एक जगह हो।


मुस्कराया वो मेरा परमात्मा,
बस यही ना जान पाये तुम अभी तक।
जानते भी तो भला पहचानते कैसे;
आवरण इतने पहन बैठे हो तुम।

तुम मेरा एक अँश ही तो हो,
पर कहाँ तुम मानते हो सत्य यह।
तुम रमे हो व्यर्थ पापाचार में,
हर तरफ़ हो रहे अत्याचार में।
पर कहाँ देखा है तुमने,
तोड़कर अपने चतुर्दिक का छलावा।
अब एक युग के बाद तुमको कहाँ वह याद होगा;
पर मुझे सब याद है,
तुम नहीं हो, मैं अकेला हुँ मगर,
याद आता है कि सब कुछ खो गया है;
आज का मानव कि वापस सो गया है।

पर अकेला ही सही,शेष हूँ मैं,
युद्धरत मैं, तुम्हारा मैं।
क्योंकि है सपना अभी भी;
जाग जाओ है समय कितना अभी भी।।